देख नहीं सकते थे तो रिकॉर्डिंग सुन-सुनकर पढ़ाई की, खुद के बलबूते पर जज बने ब्रह्मानंद शर्मा

New Delhi: कहते हैं ना कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता है. हर किसी में कुछ ना कमी जरूर होती है. लेकिन अगर आप इस कमी को अपने सपनों के बीच ना आने दें तो सफलता आपके कदमों में होगी.. कड़ी मेहनत और कुछ कर दिखाने का जुनून आपको हमेशा सफलता की राह पर ले जाता है. बुलंद हौसलों के आगे आपकी कमजोरी को भी नतमस्तक होना ही पड़ता है.

हमने ऐसी कई कहानियां सुनी है जिसमें लोग देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते, चल-फिर नहीं सकते या बोल नहीं सकते..इसके बावजूद अपने सपनों को पूरा करते हैं. ये कोई आम लोग नहीं बल्कि बेहद खास लोग हैं, जो अपनी शारीरिक क’मजोरी को अपनी मा’नसिक क’मजोरी नहीं बनाते और जिंदगी में कुछ कर दिखाने का हुनर रखते हैं.

आज हम आपको एक ऐसे ही खास शख्स की कहानी बताएंगे, जिन्होंने अपने मेहनत और बुलंद हौसलो के दम पर एक उदाहरण पेश किया है. इन्होंने वो कर दिखाया जिसकी शायद आपको उम्मीद भी ना हो.. हम बात कर रहे हैं राजस्थान के रहने वाले ब्रह्मानंद शर्मा की.

31 वर्षीय ब्रह्मानंद शर्मा एक जज हैं. लेकिन खास बात ये है कि ये बाकी जजों से अलग हैं. ये देख नहीं सकते, लेकिन इनके सुनने की शक्ति इतनी तेज है कि कोर्ट में वकीलों की आवाज से उन्हें पहचान लेते हैं. देख नहीं पाते, लेकिन बावजूद अपनी मेहनत के दम पर जज बनकर इन्होंने साबित कर दिया कि वि’कलांगता कोई अ’भिशाप नहीं है, बशर्ते आप इसे अपने दिमाग में न चढ़ने दें.

ब्रम्हानंद शर्मा राजस्थान के पहले दृ’ष्टिहीन न्यायाधीश हैं.  जब वह जज बने तो लोगों को भी हैरान कर दिया.  वह राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोट्रास गांव के रहने वाले हैं. राजस्थान के अजमेर जिले के सरवर शहर में सिविल न्यायाधीश और न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हैं.

एक वक्त ऐसा था जब देख न पाने के कारण उन्हें कोचिंग सेंटर में एडमिशन नहीं दिया गया था. इसके बाद उन्होंने सेल्फ स्टडी कर ये मुकाम हासिल किया. उन्हें जज बनना था और इसके लिए परिवार से पूरा सपोर्ट मिला. पत्नी ने दिन-रात एक कर दी. बच्चे उन्हें किताबें पढ़कर सुनाते.

भतीजे किताब पढ़कर उसे रिकॉर्ड करते और ब्रम्हानंद दिन रात उन रिकॉर्डिंग को सुनते. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई. और सपने भी पूरे हुए. उन्होंने साल 2013 में राजस्थान ज्यूडिशियल सर्विसेज (आरजेएस) की परीक्षा में 83वां रैंक हासिल किया. हालांकि, परीक्षा पास करने के बाद भी उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई. ने’त्रहीन होने के कारण उनकी ज्वाइनिंग रुक गई.ये मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति की सिफारिश की. इसके बाद ब्रह्मानंद देश के पहले ने’त्रहीन जज बन गए.

बता दें कि 22 साल की उम्र में ही ग्लेकोमा नामक बीमारी हो गई थी, जिसके वजह से उनके आंखों की रोशनी चली गई, लेकिन दिल में सफलता के दिए ज’लते रहे और आखिरकार सपनों को साकार कर दिखाया.

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