53 साल पहले अपनों से बिछड़ी पांचू बाई, मुस्लिम परिवार ने व्हाट्सएप के जरिए परिजनों का लगाया पता

New Delhi: आज के दौर में सोशल मीडिया बेहद मजबूत होता जा रहा है। हर कोई सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुंचा रहा है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल न सिर्फ आवाज उठाने और जागरुकता फैलाने में किया जा रहा है बल्कि इसका इस्तेमाल लोगों को अपनों से भी मिलाने में किया जा रहा है।

इसका बेमिसाल उदाहरण है पांचू बाई की कहानी, जो कई सालों पहले अपने परिवार से बिछड़ गई थी, जिसके बाद लोगों ने फिल्मी कहानी के तरह उनके परिजनों से मिलावाया। 93 साल की पांचू बाई अपनों से कई साल दूर रही। बताया जाता है कि करीब 52 साल वो मध्यप्रदेश के दमोह गांव में आई थी, वहां उनके ऊपर म’धुमक्खियों ने धावा बोल दिया।

ऐसे में पांचू बाई भागी और मदद के लिए चिल्लाई। चिल्लाने की आवाज सुनकर वहां मौजूद नूर खान नाम के शख्स ने उनकी जान बचाई और उन्हें अपने घर में रहने की जगह दी। नूर खान सिर्फ मराठी भाषा बोलती थी, जिसके चलते नूर खान को उनकी बातें समझने में काफी दिक्कत होती थी।

वक्त के साथ पांचू बाई नूर के परिवार का एक सदस्य बन गई और बच्चे उन्हें मौसी कह कर बुलाने लगे। एक वक्त आया, जब नूर खान का नि’धन हो गया, ऐसे में पांचू बाई को लगा कि वो अब कहां जाएंगी, क्योंकि वो नूर खान के कारण ही घर में रह रही थी, लेकिन परिवार वालों ने उन्हें नूर खान के जाने के बाद भी अपनाए रखा और उनकी अच्छे से देखभाल की। बच्चे पांचू बाई को उनके अपनों से मिलवाना चाहते थे।

इसलिए इन दिन जब बेटे इसरार ने उनसे उनके गांव के बारे में पूछा, तो उन्होंने मराठी भाषा में उत्तर देते हुए गांव का नाम बताया। मराठी भाषा को थोड़ा-बहुत समझते हुए इसरार ने उन शब्दों को गूगल पर सर्च किया और उनके पैतृक गांव पथरोट को ढूंढ निकाला।

इसके बाद व्हाट्सऐप की मदद से इसरार ने उनके गांव वालों को संपर्क कर पांचू बाई की फोटो दिखाते हुए उनके परिवार वालों का पता लगाने की गुहार लगाई। जल्द ही गांव वालों ने पांचू बाई का परिवार ढूंढ निकाला और उन्हें जानकारी दी। उनके परिवार वालों ने बताया कि पांचू बाई नागपुर में अपना इलाज कराने गई थी, वो मध्यप्रदेश के दमोह कैसे पहुंची, इस बारे में उन्हें कुछ नहीं पता। फिलहाल, पांचू बाई अपने परिवार वालों के साथ समय बिता रही है।

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